Rant on Social Issues

Sookha Gujarat

गुजरात में मदिरा की इज़ाज़त नहीं है।

अच्छा है।

अहंकार और धर्म से बीमार हिन्दू, जब होश में सरेआम मुर्दो का खून पी रहे हैं, अगर मदिरा होती तोह मदहोशी में शायद खुद की औरतों का भी गोश्त चौक पर बेच आते, आखिरकार धंधे का गढ़ है ये धरती। और मैं चाहता हूँ की दो चार चुप्पी साधे लोग जो प्रिविलिज की चाशनी में डूबे हैं, वो मदिरा में ना डूबे ताकि उनकी सफ़ेद आँखें उन आग की लपटों को देख सकें और उनकी पुतलियाँ उसमें झुलस जाएँ।

ये लोग गाँधी से कुछ नहीं सीखे, मगर उसके नाम का मलहम अपने ज़हन पर लगाते हैं ताकि अगले जन्म में खुद कहीं मुसलमान ना बन जाएँ। और ठीक भी है, कौन चाहेगा यहाँ मुसलमान बनना जहाँ आप या तो कलाम हैं या कसाब, उनके बीच में हैं तो सिर्फ आप एक ज़रिया हैं। ज़रिया गुस्सा निकालने का, बेरोज़गारी का गुस्सा, गरीबी का गुस्सा। बाजार में कोई भी गुस्सा बिक रहा हो आप खरीदो और एक दो मुसलमान जला के निकाल दो। सालों बाद अगर इतिहास की किताबों में कोई पूछता है की शाही तख़्त पर बैठा, तुग़लकी शहंशाह कौम को बचाने के लिए क्या कर रहा था तो जवाब मिलेगा की पेट्रोल महँगा कर रहा था ताकि मशालें ना जल पायें। मगर मशालें जल गई लेकिन चूल्हे ठन्डे रह गए।

कभी कभी लगता है की काश गाँधी ने अपने प्रयोगों में एक पव्वा लगा के चिकन खा लिया होता और रूमी बनके कुछ शायरी लिख दी होती, तोह आज ये आवाम भगवे मुखौटे की जगह अपने
आस पास के शोषण को देख रही होती। अपने गुस्से को मतदान में बदलती, संसद के बाहर कट्टर कानूनों को जलाती, और हर घर में एक नीली, एक हरी, एक भगवी, और बाकी सारी दीवारें लाल होती, लाल, खून से नहीं, मजदूरों के संगठन की मजबूती से लाल। शायद गाँधी की ही गलती है, थोड़ा दारु पी लिए होते।

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